बुधवार, 14 अक्टूबर 2009

रेहन पर रग्घू १ से आगे

कितने दिन हो गये बारिश में भींगे ?
कितने दिन हो गये लू के थपेड़े खाये ?
कितने दिन हो गये जेठ के घाम में झुलसे ?
कितने दिन हो गये अंजोरिया रात में मटरग़श्ती किये ?
कितने दिन हो गये ठंड में ठिठुर कर दांत किटकिटाये ?
क्या ये इसीलिए होते हैं कि हम इनसे बच के रहें ? बच बचा के चलें? या इसलिए कि इन्हें भोगें, इन्हें जिएं, इनसे दोस्ती करें, बतियाएं, सिर माथे पर बिठायें?
हम इनसे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये हमारे शत्राु हैं! क्यों कर रहे हैं ऐसा ?

इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब वे नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएंगी! वे चले जायेंगे और इस धरती का वैभव , इसका ऐश्वर्य, इसका सौन्दर्य - ये बादल, ये धूप, ये पेड़ पौधे, ये फसलें, ये नदी नाले, कछार, जंगल पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा! वे यह सारा कुछ अपनी आंखों में बसा लेना चाहते हैं जैसे वे भले चले जायं, आंखें रह जाएंगी; त्वचा पर हर चीज की थाप सोख लेना चाहते हैं जैसे त्वचा केंचुल की तरह यहीं छूट जाएगी और उसका स्पर्श उन तक पहुंचाती रहेंगी!
उन्हें लग रहा था कि बहुत दिन नहीं बचे हैं उनके जाने में! मुमकिन है वह दिन कल ही हो , जब उनके लिये सूरज ही न उगे। उगेगा तो जरूर, लेकिन उसे दूसरे देखेंगे - वे नहीं! क्या यह सम्भव नहीं कि वे सूरज को बांध के अपने साथ ही लिए जायं - न वह रहे, न उगे, न कोई और देखे! लेकिन एक सूरज समूची धरती तो नहीं, वे किस किस चीज को बांधेंगे और किस किस को देखने से रोकेंगे?
उनकी बाहें इतनी लम्बी क्यों नहीं हो जातीं कि वे उसमें सारी धरती समेट लें और मरें या जियें तो सबके साथ!
लेकिन एक मन और था रघुनाथ का जो उन्हें धिक्कारे जा रहा था - कल तक कहां था यह प्यार? धरती से प्यार की यह ललक? यह तड़प? कल भी यही धरती थी। ये ही बादल, आसमान, तारे, सूरज चांद थे! नदी, झरने, सागर, जंगल, पहाड़ थे। ये ही गली, मकान, चौबारे थे! कहां थी यह तड़प? फुर्सत थी इन्हें देखने की? आज जब मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पांव कमरे में आ रही है तो बाहर जिन्दगी बुलाती हुई सुनाई पड़ रही है?
सच सच बताओ रघुनाथ , तुम्हें जो मिला है उसके बारे में कभी सोचा था? कभी सोचा था कि एक छोटे से गांव से लेकर अमेरिका तक फैल जाओगे? चौके में पीढ़ा पर बैठ कर रोटी प्याज नमक खाने वाले तुम अशोक बिहार में बैठ कर लंच और डिनर करोगे?
लेकिन रघुनाथ यह सब नहीं सुन रहे थे। यह आवाज बाहर की गड़गड़ाहट और बारिश के शोर में दब गयी थी। वे अपने वश में नहीं थे। उनकी नजर गयी कोने में खड़ी छड़ी और छाता पर! जाड़े की ठंड यों भी भयानक थी और ऊपर से ये ओले और बारिश। हिम्मत जवाब दे रही थी फिर भी उन्होंने दरवाजा खोला। खोला या वे वहां खड़े हुए और अपने आप खुल गया! भींगी हवा का सनसनाता रेला अंदर घुसा और वे डर कर पीछे हट गये! फिर साहस बटोरा और बाहर निकलने की तैयारी शुरू की! पूरी बांह का थर्मोकोट पहना , उस पर सूती शर्ट, फिर उस पर स्वेटर, ऊपर से कोट। ऊनी पैण्ट पहले ही पहन चुके थे। यही सुबह जाड़े में पहन कर टहलने की उनकी पोशाक थी! था तो मफलर भी लेकिन उससे ज्यादा जरूरी था - गमछा! बारिश को देखते हुए! जैसे जैसे कपड़े भींगते जाएंगे, वे एक एक कर उतारते और फेंकते चले जाएंगे और अंत में साथ रह जाएगा यही गमछा!
वे अपनी साज सज्जा से अब पूरी तरह आश्वस्त थे लेकिन नंगे बिना बालों के सिर को लेकर दुविधा में थे - कनटोप ठीक रहेगा या गमछा बांध लें।
ओले जो गिरने थे , शुरू में ही गिर चुके थे, अब उनका कोई अंदेशा नहीं!
उन्होंने गमछे को गले के चारों ओर लपेटा और नंगे सिर बाहर आये!
अब न कोई रोकने वाला , न टोकने वाला। उन्होंने कहा - ÷÷ हे मन! चलो, लौट कर आये तो वाह वाह! न आये तो वाह वाह!''
बर्फीली बारिश की अंधेरी सुरंग में उतरने से पहले उन्होंने यह नहीं सोचा था कि भींगे कपड़ों के वजन के साथ एक कदम भी आगे बढ़ना उनके लिये मुश्किल होगा।
वे अपने कमरे से तो निकल आये लेकिन गेट से बाहर नहीं जा सके!
छाता खुलने से पहले जो पहली बूंद उनकी नंगी , खल्वाट खोपड़ी पर गिरी, उसने इतना वक्त ही नहीं दिया कि वे समझ सकें कि यह बिजली तड़की है या लोहे की कील है जो सिर में छेद करती हुई अंदर ही अंदर तलवे तक ठुंक गयी है! उनका पूरा बदन झनझना उठा। वे बौछारों के डर से बैठ गये लेकिन भींगने से नहीं बच सके। जब तक छाता खुले, तब तक वे पूरी तरह भींग चुके थे!
अब वे फंस चुके थे - बर्फीली हवाओं और बौछारों के बीच। हवा तिनके की तरह उन्हें ऊपर उड़ा रही थी और बौछारें जमीन पर पटक रही थीं! भींगे कपड़ों का वजन उड़ने नहीं दे रहा था और हवा घसीटे जा रही थी! उन्हें इतना ही याद है कि लोहे के गेट पर वे कई बार भहरा कर गिरे और यह सिलसिला सहसा तब खत्म हुआ जब छाता की कमानियां टूट गयीं और वह उड़ता हुआ गेट के बाहर गायब हो गया। अब उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे हवा जगह जगह से नोच रही हो और पानी दाग रहा हो - जलते हुए सूजे से!
अचेत होकर गिरने से पहले उनके दिमाग में ज्ञानदत्त चौबे कौंधा - उनका मित्रा! उसने दो बार आत्महत्या करने की कोशिश कीं - पहली बार लोहता स्टेशन के पास रेल की पटरी पर नगर से दूर निर्जन जहां किसी का आना जाना नहीं था! समय उसने सामान्य पैसेंजर या मालगाड़ी का नहीं, एक्सप्रेस या मेल का चुना था कि जो होना हो, ÷ खट' से हो, पलक झपकते, ताकि तकलीफ न हो। वह पटरी पर लेटा ही था कि मेल आता दिखा! जाने क्यों, उसमें जीवन से मोह पैदा हुआ और उठ कर भागने को हुआ कि घुटनों के पास से एक पैर खचाक्‌।
यह मरने से ज्यादा बुरा हुआ! बैसाखियों का सहारा और घर वालों की गालियां और दुत्कार! एक बार फिर आत्महत्या का जुनून सवार हुआ उस पर! अबकी उसने सिवान का कुआं चुना! उसने बैसाखी फेंक छलांग लगायी और पानी में छपाक्‌ कि बरोह पकड़ में आ गयी! तीन दिन बिना खाये पिये भूखा चिल्लाता रहा कुएं में - और निकला तो दूसरे टूटे पैर के साथ!
आज वही ज्ञानदत्त - बिना पैरों का ज्ञानदत्त - चौराहे पर पड़ा भीख मांगता है। मरने की ख्वाहिश ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा! मगर यह कम्बख्त+ ज्ञानदत्त उनके दिमाग में आया ही क्यों? वे मरने के लिये तो निकले नहीं थे? निकले थे बूंदों के लिए, ओले के लिए, हवा के लिए। उन्होंने नतीजा निकाला कि जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिए।

( २)
पहाड़पुर में रघुनाथ एक ही थे।
वैसे कहने को तो रामनाथ , शोभनाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ वगैरह वगैरह भी थे लेकिन वे रघुनाथ नहीं थे।
और रघुनाथ का यह था कि वे जब कभी जहां कहीं नजर आ जाते , गांव घर के लोग जल भुन कर एक ठंडी आह भरते - वाह! क्या किस्मत पायी है पट्ठे ने!
रघुनाथ पहाड़पुर गांव के अकेले लिखे पढ़े आदमी। डिग्री कालेज में अध्यापक। दुबले पतले लम्बे छरहरे बदन के मालिक। शुरू के दस वर्षों तक साइकिल से आते जाते थे , बाद में स्कूटर से। पिछली सीट पर कभी बेटी बैठती थी, बाद के दिनों में बेटे। कभी एक, कभी दोनों। आखिर पांच छः मील का मामला था।
हर सुखी और सफल आदमी की तरह रघुनाथ ने भी अपने जीने , आगे बढ़ने और ऊंचाइयां छूने के कुछ नुस्खे ईजाद कर लिये थे! सच पूछिए तो उन्होंने ईजाद नहीं किये थे, उनकी प्रकृति में ही थे, बस वे समझ गये थे और उन्हें अपने नित्य व्यवहार का अंग बना लिया था। वे पतले और लम्बे थे इसलिए थोड़ा झुक कर चलते थे। कहीं आते जाते समय, किसी से मिलते जुलते बोलते बतियाते समय थोड़ा झुके रहते थे। पहली बार उन्होंने अपने संदर्भ में किसी दूसरे से बात करते समय पिं्रसिपल साहब के मुंह से ÷ विनम्रता' शब्द सुना। ऐसा उनकी प्रशंसा में कहा गया था। जिस झुके रहने पर वे शर्म महसूस करते थे, वही उनकी खूबी है - यह नया बोध हुआ। इसमें उन्होंने आगे चल कर दो खूबियां और जोड़ दीं - मुसकान और सहमति। कोई कुछ कहे, वे मुसकराते रहते थे और समर्थन में सिर हिलाते रहते थे। यह तभी सम्भव है जब आप अपनी तरफ से कम से कम बोलें।
इस तरह रघुनाथ ने विनम्रता , मितभाषिता और मुसकान के साथ जीवन की यात्राा शुरू की थी।
और इसे संयोग ही कहिए कि वे कभी असफल नहीं रहे! इसी संयोग को दूसरे ÷ किस्मत' कहा करते थे! और इस पर विश्वास कर लिया था रघुनाथ ने भी!
हुआ यह कि एक बार वे कालेज से साइकिल से घर लौटने को हुए तो पाया - चेन टूट गयी है। उन्होंने साइकिल कालेज में ही छोड़ दी और पैदल चल पड़े। गर्मी का मौसम, धूप तेज, हवा का नाम नहीं, बदन पसीने से तर ब तर। रास्ते में कहीं पेड़ पालो नहीं। आकाश में बादल थे लेकिन दूर। उनके मन ने कहा - काश! वे बादल उनके सिर के ऊपर होते छाता की तरह। और देखिए, एक फर्लांग ही आये होंगे कि बादल सचमुच उनके सिर के ऊपर। और यही नहीं, वे उनके साथ साथ छाया किये हुए गांव तक आये!
अगले दिन ने यह साबित कर दिया कि वह मात्रा भ्रम नहीं था। वे क्लास लेने के लिए रजिस्टर लेकर जैसे ही चले , वैसे ही ध्यान गया कि कलम नहीं है। या तो घर छूट गयी या रास्ते में गिर गयी। वे अभी क्लास में पहुंचे भी नहीं थे कि सामने घास में गिरी एक कलम दिखी - धूप में चमकती हुई।
ऐसी बातें औरों के साथ भी होती होंगी लेकिन जाने क्यों , उन्हें लगने लगा कि दीनदयालु परमपिता की उन पर विशेष कृपा है। वह उनकी हर सुविधा असुविधा का ध्यान रखते हैं। इसीलिए वे जो चाहते हैं, वह देर सबेर होकर रहता है।
और देखिए कि उन्होंने जब जब चाहा , जो जो चाहा सब होता गया।
उन्हें कुछ करना नहीं पड़ा , अपने आप होता गया।
पढ़ाई खत्म करने के बाद रघुनाथ रिसर्च कर रहे थे और उनका मन नहीं लग रहा था। आख़िर कब तक करते रहेंगे रिसर्च ? कहीं नौकरी मिल जाती तो जान बचती!
और बहुत दिन नहीं बीते कि नौकरी मिल गयी।
इसका श्रेय उन्होंने हाल में जन्मी अपनी बेटी को दिया। बेटी लक्ष्मी होती है। वही अपने साथ और अपने लिए उनकी नौकरी लेकर आयी थी। लेकिन अब इसके बाद एक बेटा चाहिए। यह उन्होंने नहीं , उनके दिल ने कहा।
और देखिए , चार साल बाद बेटा भी आ गया। उसके बाद एक और बेटा - बस!
इस तरह एक बेटी , दो बेटे, शीला और रघुनाथ - सब मिला कर पांच जनों का परिवार। छोटा परिवार, सुखी परिवार! परिवार सुखी रहा हो या न रहा हो - रघुनाथ सुखी नहीं थे। जिन्दगी उनके लिए पहाड़पुर की धूल धक्कड़ और हंसी खेल नहीं थी। पैदा ही होना था तो स्वयं कीड़े मकोड़े की योनि में क्यों नहीं पैदा हुए? वे वहां भी पैदा हो सकते थे लेकिन नहीं, ईश्वर ने यदि उन्हें ऋषियों मुनियों के लिए दुर्लभ योनि में पैदा किया है तो इसके पीछे उसका कोई मकसद रहा होगा - कि जाओ, साठ सत्तर साल का मौका देते हैं तुम्हें; जाओ, धरती को सुंदर और सुखी बनाओ। धरती सुंदर और सुखी तभी होगी जब तुम्हारे बच्चे सुखी, सुंदर और सम्पन्न होंगे। तुम्हें जो बनना था, वह तो बन चुके; अब बच्चे हैं जिनके आगे सारी जिन्दगी और दुनिया पड़ी है। वही तुम्हारे भी भविष्य हैं। जियो तो उन्हीं की जिन्दगी, मरो तो उन्हीं की जिन्दगी।
और रघुनाथ ने यही किया। उनकी सारी शक्ति और सारी बुद्धि और सारी पूंजी उन्हें ही संवारने में लगी रही!
उन्होंने चाहा - सरला पढ़ लिख कर नौकरी करे।
सरला पढ़ लिख कर नौकरी करने लगी।
उन्होंने चाहा - संजय साफ्टवेयर इंजीनियर बने।
संजय साफ्टवेयर इंजीनियर ही नहीं बना , अमेरिका पहुंच गया!
उन्होंने चाहा - मैनेजर समधी बनें!
संजय ने यह नहीं चाहा! उसने वह किया जो उसने चाहा!
रघुनाथ का चाहा रह गया। दयानिधान कोई मदद नहीं कर सके उनकी! उन्हें अफसोस इस बात का था कि मैनेजर ने इसे बाप बेटे की मिलीभगत समझा था! वे काफी मानसिक तनाव में चल रहे थे लेकिन कालेज के उनके सहयोगियों ने उन्हें बधाइयां देकर राहत पहुंचायी - कि अच्छा हुआ, एक अंधी खाईं में गिरने से बच गये! इसमें प्रिंसिपल का रोल और अच्छा था। उसने लगभग तीस साल पहले रघुनाथ के साथ ही ज्वाइन किया था कालेज! दोनों का याराना सा था! जब भी मिलते, हंसी मजाक और हाहा हूहू करते! उसने एक दिन धीरे से कहा - ÷÷ रघुनाथ, मुझे आश्चर्य है कि इतनी सी बात तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आयी? वह तुम्हारी ही बेटी के बदले तुम्हारे बेटे को खरीद रहा था!''
इस तरह रघुनाथ सहज हो ही रहे थे कि एक दिन घर पर उन्हें प्रिंसिपल के हस्ताक्षर से नोटिस मिली। आरोप दो थे - ÷ नेग्लिजेंस आफ ड्यूटी' और ÷ इनसबार्डिनेशन'! ऐसा कोई संकेत अपनी बातों में नहीं दिया था उसने। पहले कभी!
ये दोनों आरोप निराधार! इसे रघुनाथ ही नहीं , सहयोगी भी जानते थे और प्रिंसिपल भी। सबकी सहानुभूति उनके साथ थी, लेकिन साथ देने को कोई तैयार नहीं था! उन्होंने उत्तर दे दिया था मगर जानते थे कि इससे कोई लाभ नहीं। वे बदहवास से यहां से वहां दौड़ते रहे। आजिज आकर प्रिंसिपल से मिले और उससे सलाह मांगी। उसने कहा - ÷ देखो रघुनाथ, चाहे तुम जितनी दौड़ धूप करो, निलम्बन का मन बना चुका है मैनेजर! उसकी शक्ति और पहुंच को जानते हो तुम! इसके बाद तुम कचहरी जाओगे, मुकदमा लड़ोगे, वह कब तक चलेगा कोई नहीं जानता। हो सकता है, फैसला होने के पहले ही तुम मर जाओ! हां, जब तक मुकदमा चलेगा, तब तक पेन्शन रुकी रहेगी। यह सब देख कर मेरी तो सलाह है कि तुम वी.आर.एस. ( वालंटरी रिटायरमेण्ट स्कीम) ले लो!
रघुनाथ बहुत देर तक चुप रहे! उनसे कुछ बोला नहीं गया!
÷÷ ठीक है लेकिन मेरी एक मदद करें आप!''
÷÷ बोलो, क्या कर सकता हूं मैं?''
÷÷ निलम्बन आप तब तक लटकाये रखें जब तक बेटी की शादी न हो जाय! फिर तो वही करूंगा जो आपने कहा है!''
मनुष्यता का तकाजा था ऐसा करना! प्रिंसिपल ने चिंतित होकर कहा - ÷÷ जाओ, कोशिश करूंगा लेकिन कहीं कहना मत!''
आखिरकार प्रिंसिपल कब तक इंतजार करता?

( ३)
ऐसी मुसीबत में रघुनाथ को किसी और ने नहीं , उन्हीं के बेटों ने डाला था!
बेटों में भी संजय ने! खासतौर से संजय ने!
और यह लम्बी कहानी है - रांची से कैलिफोर्निया तक फैली।
संजय ने प्यार किया था सोनल को! यह प्यार किसी सड़कछाप टुच्चे युवक का दिलफेंक प्यार नहीं था , इसमें गुणा भाग भी था और जोड़ घटाना भी! जितना गहरा था, उतना ही व्यापक! सोनल संजय के प्रोफेसर सक्सेना की इकलौती बेटी थी! थू्र आउट फर्स्ट क्लास, नेट और दर्शन से पीएचडी। नौकरी तो पक्की थी बनारस के विश्वविद्यालय में जहां उसके मामा कुलपति थे- लेकिन उसमें अभी देर थी; तब तक शादी का इंतजार था!
शादी के आडे+ आ रहे थे उसके ओठों से बाहर आ गये दांत और चिपटी नाक जिनकी क्षतिपूर्ति वह अपने सर्टिफिकेट से करती थी! रही सही कसर पूरी कर रही थी सक्सेना की फैलायी हुई यह अफवाह - कि उन्हें एक ऐसे जहीन साफ्टवेयर इंजीनियर युवक की जरूरत है जो एक अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के तीन साल के कंट्रैक्ट पर कैलिफोर्निया जा सके। इस जरूरत का मतलब पूरा इंस्टीट्यूट समझता था।
संजय फाइनल की परीक्षा दे चुका था , रिजल्ट की घोषणा बाकी थी!
इधर कई बार मां बाप का संदेश आया था कि आओ , लड़की देख जाओ!
लड़की क्या देखना , वह देखी भाली थी! रघुनाथ जिस कालेज में पढ़ाते थे, उसी के मैनेजर और पूर्व विधायक की बेटी थी! गोरी, लम्बी, सुंदर, आकर्षक। एम.ए.। अच्छी हाउस वाइफ! मैनेजर पुराने जमाने के जमींदार, अथाह सम्पत्ति के स्वामी! रघुनाथ की कोई हैसियत नहीं थी उनके आगे। न कायदे के घर दुआर, न जमीन जायदाद। आठ बीघे खेत और एक हल की खेती! बचपन और जवानी तंगहाली में गुजारी थी। बच्चों को पढ़ाया भी तो खेत रेहन रख कर और कालेज से लोन लेकर। जाहिर है, मैनेजर ने ÷ साफ्टवेयर इंजीनियर' देखा था, अपने कालेज के मास्टर रघुनाथ को नहीं।
यह सम्बंध सपने से भी आगे की चीज था रघुनाथ के लिए। फायदे ही फायदे थे इससे! जनपद में पहचान और प्रतिष्ठा जो मिलती , सो अलग! वे क्या से क्या होने जा रहे थे!
तो , गांव आने से पहले सक्सेना सर से विदा लेने गया था संजय!
इसे यों भी कह सकते हैं कि उसे डिनर पर बुलाया था सक्सेना सर ने!

गर्मी की शाम! अपने लान में सक्सेना बेंत की कुर्सी पर चुपचाप बैठे थे। माली गमलों में पानी दे रहा था। बंगले के अंदर की बत्तियां जल रही थीं। किसी कमरे से संगीत की धुन आ रही थी! रिटायरमेण्ट के करीब , दिल के मरीज प्रो. सक्सेना संजय की मौजूदगी से बेखबर चुपचाप बैठे थे और सामने देख रहे थे। काफी देर बाद उन्होंने पूछा - ÷÷ कौन सा इंस्ट्रईमेण्ट है?''
संजय ने नासमझी में सिर हिलाया!
÷÷ और राग? कौन सा राग है?''
संजय निरुत्तर , फिर सिर हिलाया!
वे मुसकराये और ऊंची आवाज में पुकारा - ÷÷ सोनू!''
जीन्स के पैण्ट और टीशर्ट में उछलती हुई सोनल आयी - ÷ हां पापा!'
संजय खड़ा हो गया। सक्सेना मुसकराये , पहले संजय को देखा, फिर सोनल को! सोनल भी मुसकरायी। संजय सोनल से मिला तो कई बार था, लेकिन देखा पहली बार। उसे लगा कि किसी लड़की को टुकड़ों में नहीं, ÷ टोटैलिटी' में देखना चाहिए! कितना फर्क पड़ जाता है? साथ ही लड़की और पत्नी को एक ही तरह से नहीं देखना चाहिए। रूप रंग, हाव भाव, नाज नखरे लड़की में देखे जाते हैं, पत्नी में नहीं! ये सब पुराने कंसेप्शन हुए - हमारे पापा मम्मी के जमाने के, हमारे नहीं!
सक्सेना ने चुप्पी तोड़ी - ÷÷ यह है सोनल! जिसमें मेरे प्राण बसते हैं। सितार, सरोद, संतूर - माने सोनल। सोनल माने संगीत। चीपनेस इसे पसंद नहीं। फिल्मी गानों को संगीत नहीं मानती! शायद इसलिए कि खुद कथक की डांसर रही है! खैर, तो क्या खिला रही हो हम लोगों को भाई?''
÷÷ वह तो तभी पता चलेगा जब खाएंगे!'' सोनल शर्मा कर भाग गयी!
÷÷ बैठो संजू!'' कहते हुए सक्सेना भी बैठ गये - सिर झुकाये। कुछ सोचते! भर्राये स्वर में बोले - ÷÷ कैसे रहूंगा इसके बगैर? रहूंगा कैसे, समझ में नहीं आता। चौदह साल की थी जब मां गुजरी थी इसकी!''
इसके बाद उनकी आंखों से आंसू गिरने लगे - ÷÷ तीन चार साल से लगातार आते रहे हैं लड़के। एक से एक। तुम्हारे सीनियर भी, क्लासफेलो भी! लेकिन बेटा, भारी संकट में हूं। तुम्हीं उबार सकते हो इससे! पिछले साल ही कहा था इसने कि शादी करूंगी तो संजय से। नहीं तो जरूरी नहीं है शादी। अपने अंदर छिपाए रहा इस बात को। आज कह रहा हूं वह भी इसलिए कि फैसले की घड़ी आ गयी है! तीन ही चार महीने का समय है कैलिफोर्निया जाने का। इसी बीच शादी है, एयर टिकट है, पासपोर्ट है, बीजा है, सारी तैयारियां हैं। सोनल अमेरिका और हनीमून को लेकर उत्साहित है।''
उन्होंने आंखें पोंछी और संजय को देखा - ÷÷ हर बाप के सपने होते हैं। मेरे भी हैं। न होते तो सैन्ट्रो कार क्यों लेता? अपने लिए फिएट तो थी ही! नयी घर गृहस्थी के सामान क्यों जुटाता? तुम्हारे ही नगर में एक कालोनी है - ÷ अशोक विहार' । उसमें एक छोटा सा बंगला बनवाया है! सब कुछ कम्प्लीट है, बस फिनिशिंग बाकी है। सोचा था कि यहां से रिटायर करूंगा तो ÷ काशी वास' करूंगा! हर आदमी यह चाहता है। तुम्हारे पापा मम्मी भी चाहते होंगे। लेकिन सोचता हूं कल सोनल विश्वविद्यालय में ज्वाइन करेगी, तो कहां रहेगी? मेरा तो सारा जीवन रांची में बीता, सारे दोस्त मित्रा, रिश्ते नाते यहीं हैं, वहां जाकर क्या करेंगे? सो, बंगला उसी के नाम ट्रांसफर कर दे रहा हूं।''
संजय चिन्तित। उसकी आंखों में पापा मम्मी के चेहरे घूम रहे थे। उसे लगने लगा था कि उसने उन्हें ÷ हां' करने में जल्दी कर दी थी! बोला - ÷÷ बहुत देर कर दी सर, सोनल का मन बताने में!''
÷÷ देर सबेर कुछ नहीं होता संजू, हर चीज का समय होता है! अब यही देखो, मेरे साले प्रो. अस्थाना को बनारस में ऐसे ही वक्त पर कुलपति क्यों होना था जब सोनल थीसिस जमा कर रही थी!'' उन्होंने सिगरेट सुलगायी - ÷÷ ऐसे तो सिगरेट मना है लेकिन कभी कभी एक दो कश ले लेता हूं!..... तो तुम्हारे पापा, उनकी परेशानियां समझ सकता हूं। बताते रहे हो उनके बारे में। अभी तक बहन अविवाहित है, परेशान हैं उसकी शादी को लेकर। छोटा भाई है तुम्हारा, पिछले तीन चार साल से ÷ कैट' ÷ मैट' दे रहा है, लोकसेवा आयोग के टेस्ट दे रहा है और किसी में नहीं आ रहा है - उसकी परेशानी! बाई द वे, मेरी तो सलाह है कि वह फ्रस्ट्रेटेड होकर कुछ कर बैठे इससे पहले किसी मैनेजमेण्ट इंस्टीट्यूट में एडमीशन करा दो। ऐसे नहीं, तो डोनेशन देकर! अरे, कितना लगेगा - डेढ़ लाख? दो लाख और क्या? तुमने बताया था कि तुम्हारी पढ़ायी के लिए लोन भी लेते रहे हैं, रेहन भी रखे हैं खेत - इन सारी परेशानियों से निपटने के लिए कितने की जरूरत होगी उन्हें? उनसे बतिया कर तो देखो। क्या चाहते हैं वे? कितना चाहते हैं? देखो, बारात, धूम धाम, बाजा गाजा - ये सब फालतू की चीजें हैं। कोई जरूरत नहीं इस दिखावे और तमाशे की। शादी के लिए कोर्ट है और दोस्त मित्राों के लिए रिसेप्शन। यह मैं कर ही दूंगा, फिर? .... ऐसे एक बात बता दूं, जिस कम्पनी में और जिस कंट्रैक्ट पर अमरीका जाना है, उससे तीन साल में कोई भी इतना कमा लेगा कि अगर उसका बाप चाहे तो गांव का गांव खरीद ले। समझे?''
÷÷ सवाल यह नहीं है सर, पिता जी लोक लाज, जांत पांत में विश्वास करने वाले जरा पुराने खयालों के आदमी हैं!''
सक्सेना गम्भीर हो गये। कुछ देर तक चुप रहे। इसी बीच सोनल साड़ी में आयी - खाने पर बुलाने - ÷ देखो संजू! ÷ ला आफ ग्रेविटेशन' का नियम केवल पेड़ों और फलों पर ही नहीं लागू होता, मनुष्यों और सम्बंधों पर भी लागू होता है। हर बेटे बेटी के मां बाप पृथ्वी हैं। बेटा ऊपर जाना चाहता है - और ऊपर, थोड़ा सा और ऊपर, मां बाप अपने आकर्षण से उसे नीचे खींचते हैं। आकर्षण संस्कार का भी हो सकता है और प्यार का भी, माया मोह का भी! मंशा गिराने की नहीं होती, मगर गिरा देते हैं! अगर मैंने अपने पिता की सुनी होती तो हेतमपुर में पटवारी रह गया होता! तो यह है! मुझे जो कहना था, कह चुका। तुम्हें जो ठीक लगे, करो! हां, जाने से पहले सोनल से भी बात कर लेना!

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

रेहान पर रग्घू

पूर्व पीठीका:- काशीनाथ सिंह मेरे प्रिय लेखकों मे से एक हैं । उनकी यह रचना मुझे अत्यंत प्रिय है
रेहन पर रग्घू
काशीनाथ सिंह

जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!
शाम तो मौसम ने कर दिया था वरना थी दोपहर! थोड़ी देर पहले धूप थी। उन्होंने खाना खाया था और खाकर अभी अपने कमरे में लेटे ही थे कि सहसा अंधड़। घर के सारे खुले खिड़की दरवाजे भड़ भड़ करते हुए अपने आप बंद होने लगे खुलने लगे। सिटकनी छिटक कर कहीं गिरी , ब्यौंड़े कहीं गिरे जैसे धरती हिल उठी हो, दीवारें कांपने लगी हों। आसमान काला पड़ गया और चारों ओर घुप्प अंधेरा।
वे उठ बैठे!
आंगन और लान बड़े बड़े ओलों और बर्फ के पत्थरों से पट गये और बारजे की रेलिंग टूट कर दूर जा गिरी - धड़ाम! उसके बाद जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो वह पानी की बूंदें नहीं थीं - जैसे पानी की रस्सियां हों जिन्हें पकड़ कर कोई चाहे तो वहां तक चला जाय जहां से ये छोड़ी या गिरायी जा रही हों। बादल लगातार गड़गड़ा रहे थे - दूर नहीं, सिर के ऊपर जैसे बिजली तड़क रही थी; दूर नहीं, खिड़कियों से अंदर आंखों में।
इकहत्तर साल के बूढे+ रघुनाथ भौंचक! यह अचानक क्या हो गया ? क्या हो रहा है?
उन्होंने चेहरे से बंदरटोपी हटायी , बदन पर पड़ी रजाई अलग की और खिड़की के पास खड़े हो गये!
खिड़की के दोनों पल्ले गिटक के सहारे खुले थे और वे बाहर देख रहे थे।
घर के बाहर ही कदम्ब का विशाल पेड़ था लेकिन उसका पता नहीं चल रहा था - अंधेरे के कारण, घनघोर बारिश के कारण! छत के डाउन पाइप से जलधारा गिर रही थी और उसका शोर अलग से सुनाई पड़ रहा था!
ऐसा मौसम और ऐसी बारिश और ऐसी हवा उन्होंने कब देखी थी ? दिमाग पर जोर देने से याद आया - साठ बासठ साल पहले! वे स्कूल जाने लगे थे - गांव से दो मील दूर! मौसम खराब देख कर मास्टर ने समय से पहले ही छुट्टी दे दी थी। वे सभी बच्चों के साथ बगीचे में पहुंचे ही थे कि अंधड़ और बारिश और अंधेरा! सबने आम के पेड़ों के तने की आड़ लेनी चाही लेकिन तूफान ने उन्हें तिनके की तरह उड़ाया और बगीचे से बाहर धान के खंधों में ले जाकर पटका! किसी के बस्ते और किताब कापी का पता नहीं! बारिश की बूंदें उनके बदन पर गोली के छर्रों की तरह लग रही थीं और वे चीख चिल्ला रहे थे। अंधड़ थम जाने के बाद - जब बारिश थोड़ी कम हुई तो गांव से लोग लालटेन और चोरबत्ती लेकर निकले थे ढूंढ़ने!
यह एक हादसा था और हादसा न हो तो जिन्दगी क्या ?
और यह भी एक हादसा ही है कि बाहर ऐसा मौसम है और वे कमरे में हैं।